
Karnataka कर्नाटक: कर्नाटक सरकार ने गुरुवार को एक महत्वपूर्ण निर्णय लेते हुए कुल 52 आपराधिक मामलों को वापस लेने का फैसला किया है। इन मामलों में कन्नड़ समर्थक कार्यकर्ताओं, किसानों, दलित संगठनों और विभिन्न सामाजिक आंदोलनों से जुड़े केस शामिल हैं। सरकार के इस कदम को राज्य में सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
वापस लिए जाने वाले मामलों में प्रमुख रूप से कन्नड़ समर्थक कार्यकर्ता वटल नागराज के खिलाफ दर्ज 10 केस शामिल हैं। इसके अलावा कावेरी आंदोलन, कन्नड़ प्रोटेस्ट और कलासा-बंडूरी आंदोलन से जुड़े कई मामलों को भी सूची से हटाया गया है। ये सभी आंदोलन राज्य में लंबे समय से जल, भाषा और क्षेत्रीय अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर केंद्रित रहे हैं।
सरकार के निर्णय में किसानों और दलित कार्यकर्ताओं के खिलाफ दर्ज मामले भी शामिल हैं, जिन्हें अब वापस लेने की प्रक्रिया शुरू की जाएगी। प्रशासन का कहना है कि यह कदम पुराने राजनीतिक और आंदोलन से जुड़े मामलों को सुलझाने की दिशा में उठाया गया है।
इसके साथ ही अलंद क्षेत्र में स्थित लाडले मुश्ताक दरगाह से जुड़े विवाद के सात मामलों को भी वापस लेने का निर्णय लिया गया है। इन मामलों में सांप्रदायिक तनाव और स्थानीय विवाद से जुड़े आरोप शामिल थे।
इस मुद्दे पर राज्य के मंत्री एच के पाटिल ने कहा कि कुछ मामलों पर अभी उच्च न्यायालय में विचाराधीन स्थिति है, इसलिए सभी केस तुरंत प्रभाव से पूरी तरह समाप्त नहीं होंगे। उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए आगे बढ़ेगी।
सरकार के इस फैसले को सामाजिक सद्भाव और लंबे समय से चल रहे आंदोलनों से जुड़े मामलों के समाधान के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। अधिकारियों का कहना है कि कई मामले ऐसे थे जो आंदोलन के दौरान दर्ज किए गए थे और अब उनकी आवश्यकता नहीं रह गई है।
इस बीच, राज्य में चल रही जनगणना की तैयारियों पर भी प्रशासन काम कर रहा है। जानकारी के अनुसार, जनगणना प्रक्रिया के दौरान गिनती करने वालों को कुल 48,275 घर बंद मिले हैं, जिससे सर्वे कार्य में कुछ चुनौतियां सामने आई हैं।
प्रशासन इन बंद घरों की स्थिति की जांच कर रहा है ताकि जनगणना प्रक्रिया को पूरी तरह और सटीक तरीके से पूरा किया जा सके। अधिकारियों का कहना है कि इन आंकड़ों का सही रिकॉर्ड तैयार करना बेहद जरूरी है ताकि सरकारी योजनाओं का सही लाभ पात्र लोगों तक पहुंच सके।
फिलहाल सरकार के इस फैसले के बाद राजनीतिक और सामाजिक हलकों में चर्चाएं तेज हो गई हैं और विभिन्न संगठनों की प्रतिक्रियाएं सामने आ रही हैं।





